स्कूल बचपन और दोस्त…

जीवन के इस मेले में…
सबके साथ या अकेले में…
जब हम बड़े हो जाते हैं…
भगदड़ में खो जाते हैं…
जब मिलता है कोई कोना….
जहाँ होता है बस खुद का होना…
वो बचपन याद दिलाता है…
गम कोसो दूर ले जाता है…

जब आकाश में तारे होते थे…
हम उनको गिनते रहते थे…
चंदा जब सबके मामा थे…
जब उनको शिकायत करते थे…

जब प्यार सभी से मिलता था…
हर फूल डाल पर खिलता था…
सावन में झूले पड़ते थे…
हम पींग बढ़ाया करते थे…

पेच पतंगो के लड़ते थे…
जब कटी तो लूट के लाते थे…
कनचों की अलेटे लगती थी…
ल्ट्टू पे झूमा करते थे…

बस्ते कंधों पर लाधे हुए…
यारों की टोली निकलती थी…
तब स्कूल भी एक मेला सा था…
जहाँ सब दिन होली मनती थी…

वो पीले फूल से याद आते हैं…
जिनको हम तोड़ा करते थे…
वो डाल अभी तक झुकी है हुई…
जिनपे हम बैठा करते थे…

टीचर के थप्पड़ खा कर के…
खुशी ज़हांन की मिलती थी…
शरारत कोई दोस्त करता था…
और नाम किसी का ना लेते थे…

डेस्क पे चढ़ के हमने भी कभी…
ऊन्च और नीच भी खेला था…
खो-खो की टीम में कभी हमने…
हर बार हार को झेला था…

गिल्ली डंडे का उस्ताद कभी…
स्कूल में किसी को बुलाते थे…
अपना नंबर आने तक फिर…
पीटी पीरियड ख़तम हो जाते थे…

लड़ने पिटने की दुनिया भी…
वहीं से शुरू सब करते हैं…
चोट पे घर झूंट बोलने पर…
पापा फिर से पीटते हैं…

यूँ ख़तम हुआ ये सब ऐसे…
अब तो बस ये कुछ यादें हैं…
इनको साथ सब रखते हैं…
बाकी ना बताने को बातें हैं…

कुछ छूट गये कुछ साथ भी हैं…
कुछ जीत गये कुछ मात भी हैं…

जीवन की पाठशाला के लिए…
वो पहली कक्षा ज़रूरी थी…
जहाँ सीखा था हमने हँसना…
दोस्त बनाना घुलना मिलना…

वो साथी अभी तक साथ मेरे…
जो टिफिन चुराया करते थे…
जो हर पल हरदम किसी भी तरहा…
साथ निभाया करते थे…

आज भी एक एहसास तो है…
यारों की हस्ती कुछ ऐसी है…
मिटते  बनते देखा सब कुछ…
पर ये आज भी सब मेरे पास ही हैं…

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