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नम

फिर हवा का रुख़ गर्म क्यूँ है.. फिर से तेरी आँख नम क्यूँ है… अए दिल इतना तो बता… ये दर्द ही तेरा मरहम क्यूँ है… जलता है तू रोज़ किसी कोने मैं पड़ा… इतने बड़े जहाँ में जगह कम क्यूँ है… पत्‍थर से धूल फिर बनती है गिरती...

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