नम

फिर हवा का रुख़ गर्म क्यूँ है..
फिर से तेरी आँख नम क्यूँ है…

अए दिल इतना तो बता…
ये दर्द ही तेरा मरहम क्यूँ है…

जलता है तू रोज़ किसी कोने मैं पड़ा…
इतने बड़े जहाँ में जगह कम क्यूँ है…

पत्‍थर से धूल फिर बनती है गिरती है रोज़…
फिर भी अब तक पत्थर तू सनम क्यूँ है…

रोज़ देती है कसक जीने की जानिब ये तेरी आँखें…
पर इनमे जीने की तम्माना खुद कम क्यूँ है…

तेरी राह से गुज़रे होंगे कई रहबार…
पर जब अब हम हैं तो तेरा दरवाज़ा तंग क्यूँ है…

खूबसूरत कहने और होने में फ़र्क है ज़रा…
तू अपने से इतना जुड़ा और बर्हम क्यूँ है…

आईने और नज़र में थोड़ा फ़र्क है इतना…
आईना झूंठ होता है, ओर नज़र इतनी अब्तर क्यूँ है…

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