सुबहा

फिर से ये सुबहा आ गयी तंग करने…
कल रात ही चिट्ठी लिखी थी हर रात की तरहा इसे..
बोला था कि अब थक गया हूँ बस…
कल सुबा मत आना मिलने मुझसे..
पर मानती नहीं ये कभी भी मेरा कहना
शायद मेरी तरहा ये भी ज़िद्दी है… परेशान है खुद से…
पर फिर मैं इसे समझता हूँ की तेरे पास बोहोत हैं लोग जगाने के लिए,
मैं अकेले हूँ, मुझे रहने दिया कर… ना मिला कर रोज़…

पर ये बोलती है कि जब सूखी ज़मीन के लिए मैं आती हूँ तो सूखे दरखतों को मैं कैसे रहने दूं…
मेरे लिए सब एक है, मुझे सबसे मोहोब्बत है…
इसे शायद मोहोब्बत का मतलब नहीं मालूम, इसीलिए ऐसा बोलती है…
अगर मोहोब्बत होती तो शायद मेरे पहले खत का चुपचाप जवाब मिलता…
यूँ इतने खत रोज़ रात ना लिखने पड़ते…
यूँ तवज्जो ना देनी होती मुझे खुद के खतों को… ये इंतज़ार ना होता जवाब का…
फिर से लिखना है आज रात एक खत सुबहा को…
शायद कभी जवाब आए, शायद मेरा लिखना बंद हो कभी…

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