कसम…

ये जो तुमने ना बात करने की कसम खायी है…
ये बारिश आज यूँ ही नहीं आई है…

इज़ाफ़ा हो गया आज मेरी ज़िन्दगी में यूँ…
ऐसे जो तुमने रूठने की रसम निभाई है…

तुम्हें लगता है कि अब मैं भी बदल गया हूँ यूँ…
बस हमने तो आज कपड़ों से स्याही हटाई है…

इंतज़ार तब तलक  ही हसीन लगता है…
जब तक कोई दिलबर कोई रुसवाई है…

खफा होने का ये जो भरम रखा है…
तुम्हें लगता है कि हम अब भी तेरी परछाई हैं…

अब बस कर और नीचे आजा…
पता चले कि तेरे लिए कोई ज़मीन नहीं बच पाई है…

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