ज़िन्दगी…

ज़िन्दगी ज़रा एहसास तो दे…
जो बुझे न कभी, वो प्यास तो दे..
आ ज़रा वक़्त निकाल मेरे लिए…
चलें कहीं दूर तलक, अपना हाथ तो दे…

वो चार लम्हें में सिमट के कैद रखना मुझे,
वो काम के बोझ तले तेरा मुरझा जाना,
वो रोज़ तेरा मुझसे लड़ना हर बात पे,
सब रख एक तरफ,
मुझे तेरे होने का, तेरा मुझमें खोने का… एहसास तो दे…

थका थका सा सूरज निकलता है कई दिनों से…
रातों की लंबाई खिंच खिंच के बढ़ गयी है…
वो जो तू बैठ के साथ गुफ्तगू करती थी…
उन पलों का तो पता नही,
बस हर लम्हा तू अब मुझसे लड़ रही है…

जब खो जाऊंगा कहीं तारों में,
या मिट्टी घोल लेगी मुझे खुदमें,
तब तू दूसरों की आँखों से तलाशेगी मुझे,
पर वक़्त की तरह मैं भी फिर लौट ना आऊंगा,
और ये सब हो जाये कभी, इससे पहले,
इस परवाज़-ए-अदम को नया ज़ोर-ए-परवाज़ तो दे

रूबरू हो, आ बैठ,
बता क्या सिला है मेरी नाकामियों का…
बता क्या ठीक करूँ, कैसे करूँ…
बातों से हल होते सुना है मसलों को…
बस एक बार बात करने के जज़्बात तो दे…

हाँ मैं गलत ही रहा जब भी आइना देखा…
बस सही होने के मायने नही पता चले…
और तू भी तो खेलती रही इधर-उधर…
ना पास रही ना दूर गयी,
अब खामोशियों के पिंजरे से, आवाज़ तो दे…

spacer

2 comments on “ज़िन्दगी…

Leave a reply