दौर

 

वो भी एक दौर था, ये भी एक दौर है
तू कल कुछ और था, तू आज कुछ और है

मोहोब्बत का जुनून चढ़ा था, फितूर था
वो कल की कोई रात थी, अब आज दूसरी भोर है

गाया किए नगमें यूही बैठे रहे बेसब्र से
वो मेरी आँख का पानी था, अब कहाँ घटा घनघोर है

चला गया वो मौसम जब मिले थे गुल कभी
अब कहाँ वो तनहाईयाँ, हर तरफ ही शोर है

वो दिल, वो जान, वो कसक कहाँ से लाउँ
जो मैं था वो मिट गया, बाकी बची एक डोर है

कुछ तो रहम करते, जो रहनुमा बने थे लोग
यूँ पके मकान में कच्चा सा दिल, धड़कता पुरज़ोर है…

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